एशिया का नेतृत्वकर्ता होगा भारत

एशिया का नेतृत्वकर्ता होगा भारत

कुलिन्दर सिंह यादव

एशियाई देशों का 21वीं सदी में बढ़ता प्रभाव और खासकर भारत नेतृत्वकर्ता की भूमिका में आने के लिए लगातार आवश्यक कदम उठा रहा है | जिससे दुनिया के सामने खड़ी व्यापारिक मतभेद, तकनीकी असमानता, कनेक्टिविटी, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और समुद्री सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना प्रभावी ढंग से किया जा सके | बदलते वैश्विक परिदृश्य में वर्ल्ड बैंक, डब्ल्यूटीओ जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापारिक संस्थाओं में बदलाव और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विस्तार आवश्यक हो गया है | भारत भौतिक और डिजिटल कनेक्टिविटी के जरिए क्षेत्रीय संपर्क और सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रयासरत है | ताकि पूरे क्षेत्र में समृद्धि और विकास सुनिश्चित हो सके |
विश्व परिदृश्य आर्थिक दृष्टि से और सैन्य दृष्टि से बहुध्रुवीय है | लेकिन राजनैतिक दृष्टि से एक ध्रुवीय है | वर्तमान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में ग्लोबल विलेज व्यवस्था में भारत उभरती आर्थिक ताकत के रूप में आगे बढ़ रहा है | इसलिए लगभग सभी विकासशील देश भारत को अपना नेतृत्वकर्ता स्वीकार कर चुके हैं | विकासशील देश अपने पर्यावरण, व्यापार, की रक्षा के लिए और आतंकवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में जिन पर संरक्षणवाद का आरोप लगता रहा है में भारत को अपनी आवाज के रूप में देखते हैं | भारत में कई अवसरों पर विकासशील देशों के हितों में अनेक अंतरराष्ट्रीय मंच पर आवाज उठाई है |
हाल ही में संपन्न हुए जी 7 सम्मेलन में सबसे चर्चित मुद्दा आर्थिक हितों से संबंधित था | इसलिए विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय मुद्दों पर और आतंकवाद से संबंधित मुद्दों पर पक्षपात रहित फैसलों के लिए भारत हमेशा संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन के विस्तारीकरण पर जोर देता आया है | क्योंकि अभी तक महत्वपूर्ण संस्थाओं में कुछ विकसित देशों का एकाधिकार स्थापित है | जिससे फैसले निष्पक्ष नहीं हो पाते हैं और यह विकासशील देशों के हितों पर चोट करते है |
एशिया में 4.5 बिलियन लोगों का निवास है | एशिया की जीडीपी संपूर्ण विश्व की जीडीपी का 40 प्रतिशत है | इतनी बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी नब्बे के दशक से जो नए-नए एकतरफा व्यापार के तरीके एशिया पर आध्यारोपित किए गए | अब वैश्वीकरण के इस मौजूदा चरण में इनमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है | नब्बे के दशक में भारत बंद अर्थव्यवस्था था | जबकि अब खुली अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गया है | अब भारत रॉकेट प्रक्षेपण यान, लड़ाकू हवाई जहाज से लेकर पनडुब्बियों तक स्वयं निर्मित कर रहा है | जिसके लिए पहले भारत विश्व के अन्य देशों पर निर्भर था | यहां तक कि विश्व के कई विकसित देश भी अब अपने उपग्रहों को भेजने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान का सहारा लेते हैं | क्योंकि भारत सबसे कम लागत में उपग्रहों को प्रक्षेपित कर पाता है | पहले भारत वीजा और मास्टर कार्ड जैसे पेमेंट गेटवे पर निर्भर रहता था | लेकिन अब भारत का स्वयं का पेमेंट गेटवे रूपए है | जिसको वैश्विक स्तर का बनाने के लिए भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है |
भारत सरकार को अब आवश्यकता है | अपनी सेवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने का जिससे पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का जो लक्ष्य है, उसको आसानी से प्राप्त किया जा सके | पिछले दशकों में भारत को जो एक आयातक देश का टैग मिला हुआ था |इसको अब निर्यातक देश के रूप में बदलने की आवश्यकता है | वर्तमान सरकार लगातार एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अंतर्गत दक्षिण एशियाई देशों से रोड कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए कार्य कर रही है | बिम्सटेक जैसे मंचों के माध्यम से दक्षिण एशियाई देशों से व्यापारिक, राजनैतिक और सैन्य संबंधों को बढ़ावा दिया जा रहा है | इससे निश्चित है कि हमारा व्यापार बढ़ेगा और भारत एशिया में नेतृत्वकर्ता की भूमिका में उभरकर सामने आएगा | विश्व के लगभग बारह से पंद्रह देश ऐसे हैं, जो रिजर्व करेंसी के रूप में भारतीय रूपए को रखते हैं | जिस प्रकार से हम यूरो, जापानी येन और डॉलर को रखते हैं | विभिन्न निष्कर्षों से भारत की बढ़ती शक्ति और नेतृत्वकर्ता के रूप में सार्वभौमिक स्वीकार्यता की पुष्टि होती है |
किसी देश के सामाजिक, आर्थिक विकास में उस देश विशेष में और आसपास के क्षेत्रों में शांति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सुरक्षा का माहौल होना अति आवश्यक होता है | भारत के परिपेक्ष में वर्तमान समय में स्थायित्व बना हुआ है |नक्सल क्षेत्र दिन-प्रतिदिन सिकुड़ रहा है | उत्तर पूर्व भारत में पिछले कुछ वर्षों से शांति बनी हुई है और उम्मीद है आने वाले कुछ वर्षों में जम्मू कश्मीर में भी शांति स्थापित हो जाएगी | इसके साथ-साथ भारत सरकार को अब हिंद महासागर क्षेत्र पर ध्यान आकर्षित करने की जरूरत है, और खाड़ी देशों में चल रहे विवाद पर भी हमें कूटनीतिक प्रयासों के जरिए शांति स्थापित करने का प्रयास करना होगा | क्योंकि विश्व की दो तिहाई ऊर्जा आपूर्ति उन्हीं मार्गों से होती है और किसी भी प्रकार की अशांति से देश के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा | भारत ने जिस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों में अपनी कूटनीति का परचम लहराया है | निश्चित है कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक नीति निर्धारण में महती भूमिका निभाएगा |

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