निजीकरण नहीं पुनः रियासतीकरण कहिए

निजीकरण नहीं पुनः रियासतीकरण कहिए

कुलिन्दर सिंह यादव

मौजूदा केंद्र सरकार द्वारा अपने पहले कार्यकाल से ही चलाई जा रही निजीकरण की रेल ने अब भारतीय रेलवे को भी अपने आगोश में ले लिया है | हाल ही में कुछ ट्रेनों के संचालन की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को दी गई है | जिसमें आगे शताब्दी और राजधानी जैसी लाभ में चल रही ट्रेनों को भी निजी क्षेत्र को देने की बात हो रही है | इसी के साथ ही अगले सप्ताह तक कुछ महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपक्रमों को भी निजी क्षेत्रों को बेचा जाना सुनिश्चित हुआ है | इससे पहले कुछ माह पूर्व ही प्रशासनिक सेवाओं के सर्वोच्च पदों पर भी निजी लोगों को बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा के पिछले दरवाजों से बैठाया गया | इन पदों पर पहुंचने में एक आईएएस अधिकारी को 30 से 40 वर्ष लग जाते हैं और मात्र 20 प्रतिशत आईएएस अधिकारी ही इन पदों को हासिल कर पाते हैं | केंद्र सरकार को इस बात की आशंका थी कि उनके चहेते एशिया की सर्वोच्च परीक्षा को पास नहीं कर सकते हैं, इसलिए पिछले दरवाजे का विकल्प चुना गया | इन आंकड़ों से निजी लोगों को जिन पदों पर बैठाया गया है, उसकी महत्ता पता चलती है | विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा इस मुद्दे पर मौन धारण करना दर्शाता है कि वह भी अपनी बारी के इंतजार में हैं | जिससे वह भी अपने चहेतों को इन पदों पर बैठा सकें | यह दुर्भाग्यपूर्ण पूर्ण है |

मात्र 70 साल में ही बाजी पलट गई | हम जहां से चले थे वहीं पर पुनः पहुंच गए हैं | 1947 में जब देश आजाद हुआ था | नई नवेली सरकार व उसके मंत्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए प्रयासरत थे | उनके अथक प्रयासों के बाद ही देश के तकरीबन 562 रियासतों का भारत में विलय कराया जा सका था | यह विलय आवश्यक इसलिए था क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं के पास थी | परिणाम स्वरूप देश की सारी संपत्ति सिमटकर गणतांत्रिक पद्धति वाले संप्रभु भारत के पास आ गई | धीरे-धीरे बैंक, रेल और कारखानों का राष्ट्रीयकरण किया गया | जिससे एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हो सका मौजूदा समय में सरकारें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार होकर राजनैतिक परिवर्तन पर उतारू हैं | लाभ और मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनेता देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहते हैं | यानी देश की संपत्ति पुनः रियासतों के पास होगी | लेकिन यह नए रजवाड़े देश के बड़े़े-बड़े राजनेता और पूंजीपति घराने होंगे | निजीकरण की आड़ में पुनः देश की सारी संपत्ति देश के कुछ पूंजीपति घरानों को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है | निश्चित है कि इससे लोकतंत्र खतरे में होगा और देश उन पूजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़ों की शक्ल में उभर कर सामने आएंगे |

यह नए पूंजीपति घराने पुराने राजाओं की तरह अस्पताल, धर्मशाला, स्कूल और प्याऊ नहीं बनवाने वाले हैं, जैसा की रियासतों के दौर में होता था | यह हर कदम पर पैसा उगाही करने वाले अंग्रेज होंगे | कुछ समय बाद इनकी मांग यह भी होगी कि सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों से कोई लाभ नहीं है इनको भी निजी हाथों में दे देना चाहिए | प्राइवेट स्कूल और प्राइवेट अस्पताल किस तरह से लोगों से धन उगाही करते हैं, इस विषय पर ज्यादा बोलने की आवश्यकता नहीं है | जिन लोगों को प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट अस्पतालों से संतुष्टि हो | ऐसे लोगों को रेलवे के निजीकरण, सार्वजनिक कंपनियों के बेचे जाने को और प्रशासनिक सेवाओं में सरकार के चहेतों को शामिल करने का स्वागत करना चाहिए |
सरकार कब तक घाटे का बहाना बना कर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचती रहेगी | यदि कोई सार्वजनिक उपकरण सही ढंग से कार्य नहीं कर रहा है तो यह उसके प्रबंधन की कमी है | हमें उसको ठीक करने की जरूरत है, ना की निजी हाथों में सौंप देने की | ऐसे लोगों को दिल्ली सरकार से सीख लेने की आवश्यकता है | दिल्ली में मौजूदा नेतृत्व से पहले शिक्षा और स्वास्थ्य का वही हाल था | जिस प्रकार से अन्य राज्यों में है, जहां पर शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र को सौंपने की बात की जा रही है | लेकिन नई सरकार के गठन के तुरंत बाद से सही रणनीति और उनके क्रियान्वयन के फलस्वरूप आज दिल्ली में शिक्षा की व्यवस्था विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है | इसलिए हमें आवश्यकता है कि घाटे में चल रही कंपनियों और अन्य संस्थानों के प्रबंधन में सुधार किया जाए और व्यक्तिगत हित और पार्टी हित से ऊपर उठकर नियमों का क्रियान्वयन कराया जाए | निजी हाथों में देना इसका विकल्प नहीं है |

मौजूदा केंद्र सरकार को अपने अतिरिक्त खर्चों में कटौती करने के साथ अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयास करना होगा | इसके साथ ही बड़े-बड़े विनिवेश लक्ष्यों को भी कम करने की आवश्यकता है | लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य होता है | निजीकरण को बढ़ावा देकर राज्य अपने इस कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकता है | केंद्र सरकार को घाटे में चल रही सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंधन तंत्र में सुधार करने की आवश्यकता है | हमें सार्वजनिक उपक्रमों की जिम्मेदारी कुशल नेतृत्वकर्ता को देने की आवश्यकता है | भारत जैसे देश में कुशल नेतृत्वकर्ताओं का अभाव नहीं है | विश्व की ज्यादातर सर्वोच्च कंपनियों को भारतीय ही नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं यह इसका जीता जागता उदाहरण है | इसलिए मौजूदा केंद्र सरकार को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए निजीकरण की रेल को अब विराम देने की आवश्यकता है |

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