असम: एनआरसी और डी वोटर पर विवाद

असम: एनआरसी और डी वोटर पर  विवाद

कुलिन्दर सिंह यादव

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हाल ही में असम सरकार ने वर्ष 2019 में जारी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में शामिल 10 से 20 प्रतिशत नामों के पुनः सत्यापन की अपनी मांग को दोहराया है, जिसके बाद एक बार फिर से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मुद्दा सुर्खियों में आ गया है | हालांकि पूर्व में असम के एनआरसी समन्वयक द्वारा 27 प्रतिशत नामों के पुनः सत्यापन की बात को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था | असम सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में राज्य में सक्रिय विदेशी अधिकरणों द्वारा अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों को विदेशी नागरिक घोषित किया जा चुका है | जिनमें से कुछ को वापस उनके देश भेजा जा चुका है | वर्तमान समय में असम राज्य में सौ अधिक विदेशी अधिकरण सक्रिय हैं | इन्हीं अधिकरणों के माध्यम से अपने बहिष्कार के खिलाफ व्यक्ति अपील कर सकता है |

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अवैध प्रवासियों का मामला असम के संबंध में विवादित रहा है | स्वतंत्रता के बाद से ही असम क्षेत्र में अवैध प्रवासियों का घुसपैठ बढ़ता गया | यह समस्या बांग्लादेश के उदय के समय अपने चरम स्तर पर पहुंच गई | अवैध प्रवासियों के बढ़ते दबाव के कारण असम राज्य में गंभीर जनसांख्यिकीय बदलाव देखने को मिले | इस गंभीर समस्या के चलते असम के स्थाई निवासियों के समक्ष अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को बचाए रखने का संकट उत्पन्न हो गया | बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों की बढ़ती संख्या के कारण असम राज्य में सामाजिक नैतिक तनाव देखने को मिला | जिसकी पृष्ठभूमि में असम आंदोलन एक छात्र आंदोलन के रूप में उठ खड़ा हुआ | इन्हीं आंदोलनों के चलते असम राज्य में विद्रोही संगठनों को अपनी जड़ मजबूत करने का अवसर मिल गया | आंदोलन के कुछ ही वर्षों बाद उल्फा जैसे संगठन उठ खड़े हुए | बाद में भारी विरोध के चलते केंद्र सरकार को वर्ष 1985 में आंदोलनकारियों से समझौता करना पड़ा जिसको असम समझौते के नाम से जाना जाता है |

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असम समझौते के अंतर्गत केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने का वादा किया था | सर्वप्रथम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर वर्ष 1951 में तैयार किया गया था | सरल शब्दों में कहें तो एक ऐसा रजिस्टर जिसमें भारतीय नागरिकों के विवरण को शामिल किया जाए | लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों की उदासीनता के कारण यह लंबे समय तक क्रियान्वित नहीं हो सका | अंत में सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद वर्ष 2019 में अंतिम रूप से अपडेट के साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर प्रकाशित किया गया | जिसमें 1.9 मिलियन लोगों को विदेशी घोषित किया जा चुका है | एनआरसी से बाहर किए गए लोग ऐसे लोग हैं जो यह प्रमाणित करने में विफल रहे हैं कि वह 24 मार्च 1971 से पहले भारत के नागरिक रहे हैं | विदेशी अधिकरणों के सुस्त रवैए के कारण चुनाव आयोग द्वारा विदेशी नागरिक होने के संदेह के आधार पर असम की मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की है संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिनको डी वोटर के नाम से जाना जाता है | विदेशी अधिकरणों के समक्ष डी वोटरों के लगभग 83000 मामले अभी भी लंबित हैं |

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कोविड-19 के चलते एनआरसी से बाहर किए गए 19 लाख लोगों को अभी भी अस्वीकृति आदेश जारी नहीं किया जा सका है | जिसके चलते लोग अपने बहिष्कार के खिलाफ विदेशी अधिकरण में अपील नहीं कर सकते हैं | अस्वीकृति आदेश ही बहिष्कार के खिलाफ विदेशी अधिकरण में अपील की अनुमति प्रदान करता है | यह भी सच्चाई है कि विदेशी अधिकरणों के गैर जिम्मेदाराना रवैए के कारण बहुत सारे ऐसे भारतीय भी हैं, जिनको अवैध प्रवासी घोषित किया जा चुका है | वहीं दूसरी तरफ अवैध प्रवासियों के कुछ ऐसे समूह भी हैं जिनको भारत का नागरिक माना जा चुका है | ऐसा इसलिए क्योंकि इन समूहों द्वारा अवैध तरीके से भारत सरकार के पहचान पत्र बनवाए जा चुके हैं | इसलिए एक बार फिर से सत्यापन की मांग जायज है, पुनः सत्यापन से कम से कम अवैध तरीके से भारत सरकार के मान्य पहचान पत्र बनवा कर एनआरसी में शामिल होने वाले घुसपैठियों को निकाला जा सकेगा | वहीं दूसरी तरफ ऐसे भारत के नागरिकों को जिनको एनआरसी में जगह नहीं मिल पाई है उनको एनआरसी में शामिल करने का मार्ग प्रशस्त होगा | केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि किसी भी भारतीय नागरिक को धर्म जाति के आधार पर भारत की नागरिकता से वंचित ना किया जाए |

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