हॉन्ग कॉन्ग में चीन की विवशता

कुलिन्दर सिंह यादव

हॉन्ग कॉन्ग में पिछले दो महीने से लाखों लोग सड़क पर प्रदर्शन कर रहे है | पिछले दिनों प्रदर्शनकारियों ने हॉन्ग कॉन्ग के हवाई अड्डों और बंदरगाहों के परिचालन को ठप कर दिया जिससे पूरे विश्व का ध्यान हॉन्ग कॉन्ग पर पड़ा दिन-प्रतिदिन बढ़ते इस प्रदर्शन ने तियानानमेन की याद ताजा कर दी | तियानानमेन में 1989 में इसी तरह से भारी संख्या में छात्र लोकतंत्र की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और चीन ने इस प्रदर्शन को कुचलने के लिए अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के द्वारा निहत्थे छात्रों पर गोलियां बरसाई जिसमें हजारों छात्र मारे गए थे तियानानमेन स्क्वायर चीन के इतिहास का काला अध्याय था हालांकि चीन ने उस समय के अपने बयानों में हमेशा कहा है कि ऐसी कोई भी घटना नहीं घटी थी लेकिन इस घटना के फोटो उन लोगों के पास हैं जो इस गोलाबारी में बच गए थे इसलिए इस घटना से इंकार नहीं किया जा सकता |
वर्तमान समय में विश्व के अनेक विश्वविद्यालय परिसरों में चीन और हांगकांग के छात्रों के बीच झड़पें हो रही हैं जो दर्शाता है कि दोनों पक्षों की भावनाएं चरम पर हैं हांगकांग की सड़कों पर प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने हैं लोगों की लगातार बढ़ती संख्या से कानून-व्यवस्था की स्थिति बदहाल हो चुकी है यह आंदोलन वैश्विक रूप ले चुका है विश्व के प्रत्येक कोने से इसको समर्थन भी मिल रहा है |
इस वर्ष की शुरुआत में हॉन्ग कॉन्ग अपराधिक प्रवृति के लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय ना बने इसके लिए स्थानीय सरकार ने आपराधिक कानून संशोधन विधेयक 2019 पेश किया जिसमें अपराधियों के प्रत्यर्पण और पारस्परिक कानून सहायता का प्रावधान किया गया है यही परिवर्तन इस विरोध प्रदर्शन की जड़ है स्थानीय लोगों को आशंका है कि प्रस्तावित कानून के बहाने राजनैतिक विरोधियों ,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं यहां तक कि हांगकांग में रहने वाले विदेशियों को चीन या अपने देश प्रत्यर्पित किया जा सकता है यह दर्शाता है किस प्रकार से चीन अप्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभुत्व हॉन्गकॉन्ग पर बढ़ा रहा है | इसके अतिरिक्त वहां के लोगों को यह लगा कि चीन इस कानून की आड़ में उनकी विशेष स्वायत्तता का भी हनन कर रहा है जबकि एक समझौते के अनुसार चीन ने 2047 तक हॉन्गकॉन्ग में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप ना करने का वादा किया है |
हालांकि इस विधेयक को निलंबित किया जा चुका है लेकिन लोगों की मांग है कि इसे वापस लिया जाना चाहिए जिस प्रकार से चीन द्वारा लगातार प्रदर्शनकारियों पर दबाव बनाया जा रहा है यह अंब्रेला मूवमेंट की यादों को भी ताजा कर देता है जिसमें हांगकांग के नागरिकों ने अपने स्वयं की सरकार चुनने की मांग की थी इस आंदोलन में सभी वर्गों का साथ मिल रहा है लेकिन नेतृत्वकर्ता मध्यमवर्ग ही है |
आगे की संभावनाओं की बात की जाए तो इसमें छात्र ,व्यापारी वर्ग और सरकारी कर्मचारी अपने-अपने संस्थाओं का बहिष्कार कर इस आंदोलन को गति दे सकते हैं हांगकांग के ज्यादातर लोग प्राइवेट सेक्टर से संबंधित हैं इसलिए चीन प्रशासनिक मशीनरी के द्वारा इनको काबू नहीं कर सकता है इसके साथ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का जनाधार भी यहां शून्य ही है इसलिए राजनैतिक दबाव भी नहीं बन सकता चीन की जीडीपी दर जिस प्रकार से नीचे गिर रही है इस विरोध का ज्यादा दिनों तक चलना चीन के लिए लाभकारी नहीं होगा क्योंकि ज्यादातर विदेशी निवेशक हांगकांग के माध्यम से ही चीन में निवेश करते हैं और हांगकांग में अशांति का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और वह ऐसा जोखिम उठाना नहीं चाहेगा क्योंकि वह पहले से ही अमेरिका से उलझा हुआ है | अब तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी चीन के इस कदम का खिलाफत करना प्रारंभ कर दिया है |
चीन के अनुसार कुछ मुट्ठी भर प्रदर्शनकारी हांगकांग की सामाजिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें उन्होंने हिंसा का भी सहारा लिया इसके साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतीकों को नुकसान पहुंचाकर देशद्रोह का काम भी किया है यदि चीन के बयानों की सत्यता परीक्षण किया जाए तो पता चलता है चीन हांगकांग की शिक्षा, न्याय व्यवस्था को सुधारने में विफल रहा है लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिति गंभीर बनी हुई है जिसके कारण आज भी हांगकांग पुरानी शैक्षणिक व्यवस्था प्रशासनिक व्यवस्था व न्यायिक व्यवस्था से चल रहा है इन्हीं कारणों से हांगकांग स्वतंत्रता के समर्थक चीन के एक चीन सिद्धांत की अनदेखी भी करते हैं |
वर्तमान समय में चीन के पास उपलब्ध मौजूदा विकल्पों की बात की तो दो ही विकल्प नजर आते हैं जिनमें पहला यह चीन प्रदर्शनकारियों की बात मान ले और दूसरा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से इस समस्या का हल निकाले | मौजूदा परिदृश्य में चीन प्रदर्शनकारियों के सामने झुकना तो चाहता है लेकिन सोवियत रूस के विघटन की यादें उसे डरा देती हैं क्योंकि चीन के अंदर ही प्रांतों में अशांति का माहौल है जिनमें शिंजियांग प्रांत जहां पर चीन ने ग्यारह लाख उइगुर मुसलमानों को बंदी बनाकर रखा है प्रमुख है उसे यह डर सता रहा है कि हांगकांग प्रदर्शनकारियों की मांग मानने से इस तरह की अन्य मांगे चीन के अंदर से उठ सकती हैं और इस कदम से चीन के विघटन की शुरुआत हो सकती है | वहीं दूसरी तरफ यदि वह प्रदर्शनकारियों के विरोध को संपूर्ण विश्व की नजरों से बचाकर सशस्त्र बलों के द्वारा दबाना चाहे तो 21वीं सदी में जहां सोशल मीडिया प्रमुख भूमिका निभाता हो यह संभव नहीं दिखता क्योंकि संपूर्ण विश्व की निगाहें चीन पर बनी हुई हैं कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ-साथ अमेरिका ने भी चीन को पहले ही चेतावनी दे दी है जिससे मानवाधिकारों के उल्लंघन के एक नए विवाद में वह उलझना भी नहीं चाहेगा अभी हाल ही में भारत के जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के कहने पर मानवाधिकारों का मुद्दा उठाकर वह खुद ही उसी जाल में फंसता नजर आ रहा है |
मौजूदा समय में चीन द्वारा हांगकांग विवाद का शांतिपूर्ण हल बिना अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के निकालना चीन के लिए आवश्यकता से अधिक विवशता है आने वाले कुछ दिनों में उम्मीद है कि इस समस्या का शांतिपूर्ण हल निकल पाएगा क्योंकि मौजूदा परिस्थितियां चीन के विरोध में हैं |

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