ई-कॉमर्स का बढ़ता दायरा और चुनौतियां

ई-कॉमर्स का बढ़ता दायरा और चुनौतियां

कुलिन्दर सिंह यादव

त्योहारों के मौसम में हर वर्ष करोड़ों रुपए का कारोबार करने वाली ई-कॉमर्स कंपनियों और पोर्टेलो पर इस बार शिकंजा कस सकता है | व्यापारियों के संगठन कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने इन कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की है | जिसके तुरंत बाद भारत सरकार द्वारा ई-कॉमर्स कंपनियों से जवाब मांगा गया है | कंपनियों पर आरोप है कि ये कंपनियां बिग सेल के नाम पर नियमों की अवहेलना कर रही हैं | ई-कॉमर्स भारत में मार्केट बेस्ट मॉडल है | वर्ष 2017 दिसंबर तक ई-कॉमर्स कंपनियों को छूट देने की इजाजत थी लेकिन 2018 से एफडीआई रेगुलेशन में यह बताया गया कि ई-कॉमर्स कंपनियां अब छूट नहीं दे सकती हैं | इसके अतिरिक्त इसमें भंडारण को लेकर भी बात की गई है |

इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स को ही शॉर्ट फॉर्म में ई-कॉमर्स कहा जाता है | यह ऑनलाइन व्यापार करने का एक तरीका है इसके अंतर्गत इलेक्ट्रानिक सिस्टम के द्वारा इंटरनेट के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं की खरीद बिक्री की जाती है | बाजार में बढ़ती सामानों की मांग और उसकी आपूर्ति को देखते हुए ई-कॉमर्स की ऑनलाइन शॉपिंग में दो तरह के मॉडल अब ज्यादा प्रचलित हो रहे हैं | जिसमें पहला है मार्केटप्लेस मॉडल जो वर्तमान समय में भारत में अस्तित्व में है | इस मॉडल में ऑनलाइन कंपनियां केवल एक प्लेटफार्म उपलब्ध करा देती हैं जहां से कंजूमर अपनी जरूरत के मुताबिक सामान खरीद सकता है | जैसा कि अमेजन, स्नैपडील, फ्लिपकार्ट इत्यादि इसमें अन्य ऑनलाइन कंपनियों का कोई रोल नहीं होता है | इसी प्रकार दूसरा है इन्वेंटरी मॉडल इसके तहत ऑनलाइन कंपनियां इस प्लेटफार्म पर अपनी कंपनी के द्वारा सामान बेचती हैं, इसमें अलीबाबा का नाम सबसे ऊपर आता है वर्ष 2017 के पहले भारत में भी इन्वेंटरी मॉडल प्रचलित था |

खुदरा बाजार में गिरती मांग और दूसरी तरफ ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा पिछले एक पखवारे में 3 अरब डॉलर के सामान बेचने की घोषणा के बाद से कैट ने गिरते बाजार को बचाने के लिए ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की | यह समस्या भारत में ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व में जहां भी ई कॉमर्स कंपनियां पहुंच चुकी हैं, विद्यमान है | ई-कॉमर्स सशक्त माध्यम है इसलिए जहां भी इसका प्रचलन है, वहां पर इसने बाजार का नक्शा बदल दिया है | प्रतिदिन नए-नए सामानों को ई-कॉमर्स कंपनियों के वेबसाइट पर जोड़ा जा रहा है | जिससे निश्चित तौर पर खुदरा बाजार के लिए समस्या उत्पन्न हो रही है | ई-कॉमर्स कंपनियों के माध्यम से व्यापारी और खरीदार दोनों को एक ऐसा प्लेटफार्म मिल जाता है जहां पर एक ही सामान को बेचने के लिए लाखों व्यापारी होते हैं | इस प्रतिस्पर्धा में उपभोक्ता का फायदा होता है और समय, धन दोनों की बचत होती है | इस प्रतिस्पर्धा में खुदरा व्यापारी टिक नहीं सकते हैं | इसलिए उनके द्वारा लगातार ई-कॉमर्स के खिलाफ शिकायतें की जा रही हैं |

इस विवाद के निराकरण के लिए आवश्यक है कि दोनों को समान नजरिए से देखा जाए | भारत के पास दो से तीन करोड़ लोग खुदरा व्यापार में लगे हैं, तो वही लगभग 130 करोड़ उपभोक्ता भी हैं | हमें तीन करोड़ व्यापारियों के साथ-साथ 130 करोड़ उपभोक्ताओं का भी ख्याल रखना होगा, जिससे उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ ना बढ़ सके | ई-कॉमर्स के माध्यम से व्यक्ति के समय और धन दोनों की बचत होती है | इसके अतिरिक्त उच्च प्रतिस्पर्धा के कारण सामानों की गुणवत्ता भी ठीक रहती है और उपभोक्ता को रिटर्न पॉलिसी का भी लाभ मिलता है | यदि ई-कॉमर्स को प्रारंभिक दिनों की भांति छूट भी दी जाती है, तो यह भी उचित नहीं रहेगा | भारत सरकार को खुदरा व्यापारियों और ई-कॉमर्स कंपनियों दोनों के हितों के साथ सामंजस्य बनाने की आवश्यकता है | इनमें से प्रत्येक का अपना महत्व है जिसको नकारा नहीं जा सकता | यदि हम ई-कॉमर्स कंपनियों के हितों को नजरअंदाज करते हैं | तो निश्चित तौर पर भारत में हो रहे विदेशी निवेश में कमी आएगी और इसका नकारात्मक प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा |

गौरतलब है कि ई-कॉमर्स के जरिए सामान सीधे उपभोक्ता को प्राप्त होता है | इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होती है | ऑनलाइन शॉपिंग में ग्राहकों और व्यापारियों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच आसान हो जाती है | ई-कॉमर्स के जरिए परिवहन के क्षेत्र में भी सुविधाएं बढ़ी हैं जैसे ओला और उबर की सुविधा | इसके अतिरिक्त मेडिकल, रिटेल, बैंकिंग, शिक्षा, मनोरंजन और होम सर्विस जैसी सुविधाएं ऑनलाइन होने से लोगों की सहूलियत में बड़ी हैं | इसलिए बिजनेस की दृष्टि से ई-कॉमर्स काफी महत्वपूर्ण होता जा रहा है | वहीं दूसरी तरफ स्पष्ट नियम और कानून ना होने की वजह से छोटे और मझोले उद्योगों के सामने कुछ चुनौतियां भी उत्पन्न हो रही हैं | जिससे बाजार की इस अंधी दौड़ में वे बड़ी-बड़ी कंपनियों का सामना नहीं कर पा रहे हैं | ऐसे में बेरोजगारी के बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है | इसलिए समय की मांग है कि केंद्र सरकार द्वारा खुदरा व्यवसायियों और ई-कॉमर्स कंपनियों दोनों के साथ बैठकर एक बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया जाए | जिससे उपभोक्ता, खुदरा व्यापारियों और ई-कॉमर्स कंपनियों तीनों केे हित सुरक्षित रह सकें |

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