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आरटीआई का बढ़ता दायरा और उसके निहितार्थ

कुलिन्दर सिंह यादव

आरटीआई के दायरे में कौन-कौन आता है, इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है | जिसके बाद से विशेषज्ञों के मध्य यह चर्चा का विषय बन गया है | सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ, ट्रस्ट और ऐसी अन्य निजी कंपनियां जो सरकार से वित्तीय मदद लेती हैं | वह सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आती हैं और अब ऐसी सभी संस्थाएं आरटीआई एक्ट के तहत जानकारी देने के लिए बाध्य होंगी | जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर एनजीओ और अन्य संस्थान सरकार से पर्याप्त मात्रा में वित्तीय मदद हासिल करते हैं | तो ऐसा कोई भी कारण नजर नहीं आता है कि कोई भी नागरिक यह जानकारी नहीं मांग सकता है कि एनजीओ या अन्य संस्थान उनके दिए पैसों का इस्तेमाल कहां कर रही हैं |
सूचना के अधिकार को प्रजातंत्र को सुदृढ़ करने और लोक केंद्रित अधिशासन की शुरुआत करने की राह में एक कुंजी के रूप में देखा जाता है | सूचना की सुलभता निर्धन और समाज के कमजोर वर्गों को सरकारी नीतियों एवं कार्रवाई के विषय में सूचना की मांग करने तथा उसे प्राप्त करने के लिए सशक्त बना सकती हैं | जिससे उनको लाभ हो सकता है | उत्तम शासन के बिना नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हो सकता | उत्तम शासन के चार प्रमुख घटक पारदर्शिता, जवाबदेही, पूर्वानुमान और भागीदारी है | सूचना के अधिकार का अर्थ सरकार के अभिलेखों को सार्वजनिक संवीक्षा के लिए खोलना है | जिससे नागरिकों को यह जानने का एक मजबूत साधन मिल सके कि सरकार क्या कार्य करती है ? तथा कितने प्रभावी ढंग से करती है | इससे सरकार को अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है | पारदर्शिता संगठनों को अधिक उद्देश्यपरक ढंग से काम करने के लिए बाध्य करती है | जिससे कि पूर्वानुमान में बढ़ोतरी हो सके | संगठनों के कामकाज के बारे में सूचना नागरिकों को प्रभावी ढंग से शासन प्रक्रिया में भाग लेने में समर्थ बनाती है | यह एक मूल भावना है, सूचना का अधिकार उत्तम शासन की एक बुनियादी जरूरत है | सार्वजनिक मामलों में पारदर्शिता की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम अधिनियमित किया | यह एक महत्वपूर्ण विधान है जो लोगों को सशक्त बनाता है | समय-समय पर इस विधेयक में आवश्यक संशोधन भी किए गए हैं | कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग सूचना का अधिकार और केंद्रीय सूचना आयोग का नोडल विभाग है |
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है | यह नागरिकों को सशक्त बनाएगा इस फैसले से आरटीआई का दायरा बढ़ा है और काफी सारी शक्तियां आम आदमी को दी गई हैं | सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में जो अहम बदलाव देखने को मिला है | वह यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई के दायरे में कौन-कौन सी संस्थाएं, एनजीओ और अन्य लोग आएंगे इसको विस्तृत करने के साथ-साथ स्पष्ट भी कर दिया है | अब जो भी संस्थान नई स्पष्टीकरण के बाद आरटीआई के दायरे में आएंगी | आम-आदमी अब उनके वित्तीय जानकारी के साथ-साथ उनके संगठन के बारे में, उनके क्रियाकलापों के बारे में और उनके कार्यक्षेत्र के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकता है | पहले आरटीआई के माध्यम से आम आदमी की पहुंच ऐसे संगठनों के वित्तीय जानकारी तक ही होती थी | सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से अब उन सभी संस्थाओं के प्रत्यक्ष वित्तपोषण के साथ-साथ आम नागरिक उनके अप्रत्यक्ष वित्तपोषण पर भी सवाल कर सकेगा | जिसके अंतर्गत जमीन, बिल्डिंग और अन्य अप्रत्यक्ष सहायता आती है | स्कूल, कॉलेज, एनजीओ के साथ-साथ पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के प्रोजेक्ट भी आरटीआई के दायरे में आएंगे | पीपीपी प्रोजेक्टों तक आरटीआई का विस्तार होना अपने आप में ही इस बदलाव की महत्ता को बयां करता है | भारत में रेलवे, सड़क, हवाई अड्डों के निर्माण से लेकर अन्य बुनियादी विकास के कार्यों में पीपीपी मॉडल काफी प्रचलित है और इसमें भ्रष्टाचार के भी मामले सामने आते रहे हैं | इसलिए इसका विस्तार पीपीपी मॉडल तक होने से निश्चित है कि भ्रष्टाचार में लगाम लगेगी |

अभी तक आरटीआई के दायरे में कौन-कौन से लोग आते हैं, इसको लेकर स्पष्टता नहीं थी | बहुत सारे एनजीओ और अन्य संस्थान सरकार से पर्याप्त धन तो लेते रहे हैं | लेकिन जिस क्षेत्र विशेष में उनको खर्च करने की शर्त होती थी | संस्थाएं उन क्षेत्रों में खर्च ना कर अपने फायदे के लिए अन्य क्षेत्रों में निवेश करती थी और आरटीआई के दायरे के अंतर्गत ना आने के कारण इसकी सही जानकारी सामने नहीं आ पाती थी | ऐसे में बहुत सारे मामले कोर्ट में चले जाते थे और बरसोंं-बरसों तक उन पर कोई फैसला नहीं हो पाता था | उदाहरण के तौर पर बीसीसीआई को देखा जा सकता है | बीसीसीआई ने केंद्रीय सूचना आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया | जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस पर विचार करने के लिए भेज दिया | बाद में केंद्र सरकार ने विधि आयोग के पास भेजा और विधि आयोग में माना कि बीसीसीआई को आरटीआई के अंतर्गत आना चाहिए क्योंकि भले ही बीसीसीआई अब सरकार से वित्त नहीं लेती है | लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से बीसीसीआई के पास कई सारे स्टेडियम ऐसे हैं जो केंद्र सरकार ने लीज पर दिया है और उनकी कीमत अब करोड़ों में है | इसलिए बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में आना चाहिए | लेकिन इसको दुर्भाग्य ही कहेंगे कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है और अभी भी बीसीसीआई आरटीआई के दायरे से बाहर है | इसी तरह से इफको का मामला है जिसको सरकार द्वारा हजारों करोड़ रूपए सब्सिडी के रूप में दिया जाता है और इफको अपने कर्मचारियों को करोड़ों रुपए का तोहफा देती रहती है | लेकिन सूचना के अधिकार के अंतर्गत नहीं आती हैं |
अब आवश्यकता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जो बाकी कमी रह गई है | वह केंद्र सरकार पूरी करें जिससे की बची हुई संस्थाएं जो जनता के टैक्स के पैसों का बंदरबांट करती हैं | वह भी आरटीआई के दायरे में आ जाएं | जिसके लिए केंद्र सरकार या तो एक नोटिफिकेशन जारी करें और उसमें स्पष्ट शब्दों में कौन-कौन सी संस्थाएं आरटीआई के दायरे में आएंगी उनको अंकित किया जाए | दूसरा विकल्प यह है कि जब केंद्र सरकार ऐसी संस्थाओं, एनजीओ आदि को पर्याप्त धन उपलब्ध कराती है | तो ऐसे में जरूरत है कि संस्थाओं को धन उपलब्ध कराने से पहले ही उनसे एक शपथ पत्र ले लिया जाए | जिसमें उनको सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में स्वीकार किया गया हो | यदि ऐसा केंद्र सरकार करती है तो इन कंपनियों और संस्थाओं के पास न्यायालय में जाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा और यह स्वयं ही आरटीआई के अंतर्गत आ जाएंगी | इसके अतिरिक्त कुछ अन्य चुनौतियां भी हैं | जिनमें अभिलेखों को रखने व उनके संरक्षण की व्यवस्था, सूचना आयोगों के संचालन के लिए पर्याप्त अवसंरचना और कर्मियों का अभाव, सूचना का अधिकार कानून के पूरक कानूनों जैसे व्हिसल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन आदि पर भी केंद्र सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है |

समग्रता से देखें तो इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को फैसला बहुत पहले ही ले लेना चाहिए था | भारत जैसे देश में जहां दिन-प्रतिदिन भ्रष्टाचार के नए मामले सामने आते रहते हैं | ऐसे में उन सभी संस्थाओं, एनजीओ और अन्य कंपनियों को आरटीआई के दायरे में लाना समय की आवश्यकता है | निश्चित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का सबको सम्मान करना चाहिए | इससे एक तरफ भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी वहीं दूसरी तरफ जनता के पैसों का उपयोग जिस विशेष क्षेत्र या कार्यस्थल के लिए स्वीकृत हुआ है | उन्हीं क्षेत्रों में हो सकेगा और साथ ही पैसों की बंदरबांट पर भी रोक लगेगी |

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