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स्वच्छ वायु सबका अधिकार

कुलिन्दर सिंह यादव

भारत में अब वायु प्रदूषण धूम्रपान से एक पायदान ऊपर स्वास्थ्य के सभी जोखिमो में मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण है | यह बाहरी कणिका पदार्थों, ओजोन और घरेलू वायु प्रदूषक का संयुक्त प्रभाव है | एक रिसर्च के अनुसार बाहरी प्रदूषित वायु के संपर्क में नियमित रहने पर जीवन प्रत्याशा में लगभग 1 से 2 वर्ष की कमी होती है | जबकि घरेलू वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से जीवन प्रत्याशा में लगभग 1 वर्ष की कमी होती है | देश के वायु प्रदूषण में लगभग एक चौथाई योगदान बाहरी वायु प्रदूषण का है | इन सब का प्रभाव भारतीयों सहित दक्षिण एशियाई लोगों में देखा जा रहा है, जिससे उनकी जीवन प्रत्याशा कम हो गई है, परिणाम स्वरूप मृत्यु जल्दी हो रही है | वायु प्रदूषण शरीर के प्रत्येक अंग को प्रभावित करता है | यह तेजी से नुकसान पहुंचाता है और इसका प्रभाव लंबे समय तक बरकरार रहता है | शरीर की लगभग सभी बीमारियों में जैसे हृदय और फेफड़ों की बीमारी, मधुमेह और मनोभ्रंश, यकृत की समस्या, मस्तिष्क, पेट के अंगों, प्रजनन और मूत्राशय के कैंसर से लेकर भंगुर हड्डियों तक सभी कहीं ना कहीं वायु प्रदूषण के ही कारण हैं |

स्वच्छ हवा एक संवैधानिक अधिकार भी है फिर भी भारत में इसके लिए जंग लड़नी पड़ रही है | इसके लिए हमारा व्यवहार और सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं | समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड और राज्य सरकारों के अंतर्गत आने वाले प्रदूषण बोर्डों ने सुझाव दिया | लेकिन किसी पर भी अमल नहीं किया गया | परिणाम स्वरूप समस्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है | घर से बाहर निकलते ही प्रदूषण का बड़ा सा गैस चैंबर व्यक्ति विशेष को अपनी चपेट में ले लेता है | जिससे स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं | नासा ने अभी हाल ही में दिखाया था कि किस तरह से पंजाब और हरियाणा में पराली की आग से निकलने वाले धुएं के कारण दिल्ली और अन्य पड़ोसी राज्य पूरी तरह प्रभावित हो रहे हैं | लेकिन पर्यावरण पर हमेशा राजनीति हावी होने के कारण इस पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है |

मौजूदा समय में विकास पर्यावरण प्रदूषण की बड़ी वजह बनता जा रहा है | आज हम उसी नक्शे कदम पर चल रहे हैं जिस पर चलकर पश्चिमी देशों ने पर्यावरण का विनाश किया था | अभी हम सही ढंग से प्रदूषण को समझ ही नहीं पाए हैं सरकारी मशीनरी द्वारा समस्या की जड़ तक पहुंचने का प्रयास किया ही नहीं जा रहा है | कुछ राज्यों में शहरों में उड़ती धूल को कम करने के लिए फव्वारो वाली आधुनिक मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है | लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि हमें उस तरफ ध्यान देना होगा जहां से यह प्रदूषण जन्म लेता है | ऐसी औद्योगिक इकाइयों और अन्य परियोजनाओं के आसपास बाड़ लगाकर आधुनिक मशीनरी का प्रयोग कर इस प्रदूषण को शहरों में फैलने से रोकना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए | मौजूदा समय में 100 में से 8 लोग ही स्वच्छ हवा प्राप्त कर रहे हैं | विकास परियोजनाओं के चलते भारत में जिस तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है | आवश्यकता है कि परियोजना पूरी होने के कुछ समय बाद समग्रता से पर्यावरण के हुए नुकसान और उस परियोजना से होने वाले लाभ दोनों का अध्ययन किया जाए | इससे निश्चित तौर पर सरकारों के विकास और पर्यावरण के प्रति सोचने का नजरिया बदलेगा |

भारत में जब भी कोई नीति पर्यावरण प्रभाव को लेकर बनाई जाती है | तो उसके केंद्र में शहरी क्षेत्र ही होते हैं, शहर में घर के बाहर जितना प्रदूषण है उतना घर में नहीं है | लेकिन गांव में स्थिति उलट है, गांव में अभी भी पारंपरिक ईंधनो का उपयोग किया जा रहा है | जिसके चपेट में बच्चे और गृहणी आती हैं | इसलिए अब समय की मांग है कि जब भी पर्यावरण से संबंधित कोई नीति निर्माण किया जाए तो उसमें गांव को भी सम्मिलित किया जाए | इसके अतिरिक्त भारत सरकार का जोर इलेक्ट्रिक वाहनों पर है यह सही भी है | लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत में अभी भी पांच सौ से ज्यादा थर्मल पावर प्लांट हैं जो कोयले पर आधारित हैं | भारत की दो-तिहाई बिजली अभी भी कोयले पर आधारित प्लांटों से पैदा की जाती है | ऐसे में जब तक थर्मल पावर प्लांट ऊपर निर्भरता कम नहीं की जाती है तब तक इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना बेमानी होगा | इससे समस्या कम होने के बजाय बढ़ेगी क्योंकि जब बिजली की मांग अधिक होगी तो इसका दबाव इन्हीं थर्मल पावर प्लांटों के ऊपर होगा जो लगातार वायु प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं और मिट्टी की उर्वरता खत्म कर रहे हैं |

मौजूदा परिदृश्य में सरकारी प्रयासों से हटकर पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के लिए जन जागरूकता कार्यक्रमों को नियमित चलाए जाने की आवश्यकता है | राज्य सरकारों को स्कूली पाठ्यक्रमों में ज्यादा से ज्यादा पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अध्यायों को जोड़ना चाहिए | जिससे बचपन से ही बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके | यदि बच्चे जागरुक बनेंगे तो निश्चित तौर पर वे अपने अभिभावकों को भी इसके प्रति सचेत करेंगे और स्वयं ही जन जागरूकता का प्रसार होगा | ब्लॉक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहतर कार्य करने वालों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है | जिससे अन्य लोग भी प्रभावित हो | जब तक स्वयं व्यक्ति विशेष में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता नहीं आएगी तब तक ऐसी कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती वह मात्र कागजों में सिमट कर ही रह जाएगी | पर्यावरण संरक्षण के प्रति छात्रों को जागरूक करने के लिए उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में स्थित मालती मॉडर्न पब्लिक इंटर कॉलेज द्वारा अर्धवार्षिक परीक्षा में शामिल होने वाले सभी छात्र-छात्राओं को अपने घर पर एक वृक्ष लगाना अनिवार्य कर एक मिसाल पेश की है | अन्य संस्थाओं को भी इस तरह की मुहिम अपने क्षेत्र विशेष में चलाने की आवश्यकता है जिससे सभी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो सके |

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