पीएमसी जैसी घटना के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार

अमिता सिंह

भारतीय रिजर्व बैंक ने देश के पंजाब एंड महाराष्ट्र कोो-ऑपरेटिव बैंक के कामकाज पर 6 महीनों के लिए पाबंदी लगा दी है | बैंक की गतिविधि में अनियमितता पाए जाने पर आरबीआई ने यह कदम उठाया है | पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक का कुल कारोबार 20 हजार करोड़ रुपयों का है | इसमें 11617 करोड रुपए की राशि जमा है और बैंक ने 8383 करोड़ रुपयों का कर्ज दिया हुआ है | भारत में लगभग 31 राज्य सहकारी बैंक और 370 जिला सहकारी बैंक कार्य कर रहे हैं |

सभी तरह के को-ऑपरेटिव बैंक संबंधित राज्य सरकारों के अंतर्गत आते हैं | जिनमें बैंकिंग गतिविधि आरबीआई की गाइडलाइन के अनुसार चलती है | लेकिन सर्वोच्च पदों पर नियुक्ति राज्य सरकारें करती हैं इसमें आरबीआई का प्रत्यक्ष रूप से कोई हस्तक्षेप नहीं होता है | बैंकिंग रेगुलेटरी एक्ट 1949 के अंतर्गत अनियमितता पाए जाने पर आरबीआई इनका अतिक्रमण कर सकता है और मर्जर के लिए दिशानिर्देश जारी कर सकता है | लेकिन आज तक के इतिहास में कभी भी को-ऑपरेटिव बैंकों को बंद नहीं किया गया | यदि हम पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक को देखें तो इस बैंक द्वारा डूबते कर्ज़ों को सर प्लस किया गया | जिससे इनकी परसंपत्तियों और देयताओं में भारी अंतर हो गया | पीएमसी ने रिजर्व बैंक द्वारा बनाए गए सभी प्रकार के दिशानिर्देशों को दरकिनार किया |

अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकों का विस्तार 90 के दशक में हुआ उससे पहले कुछ ही को-ऑपरेटिव बैंक थे | बाद में जिनका क्षेत्र बढ़ने के कारण उनको अनुसूचित बैंक घोषित कर दिया गया | उदारीकरण के बाद यह सोचा गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिला सहकारी बैंक, प्राथमिक कोऑपरेटिव सोसायटी और राज्य कोआपरेटिव बैंक हैं |लेकिन शहरी क्षेत्रों में छोटे कारोबारियों और मजदूरों की पहुंच अनुसूचित बैंकों तक नहीं है | इसलिए उनको भी वित्तीय सेवा उपलब्ध कराने के लिए शहरी को-ऑपरेटिव बैंकों का गठन किया गया | जिनका दायरा 1 से 2 जिलों तक सीमित था | यह सभी बैंक आरबीआई के लाइसेंस से बने हैं और बैंकिंग गतिविधि आरबीआई की गाइडलाइन के अनुसार ही चलती हैं | लेकिन मैनेजमेंट राज्य सरकारों का है | पीएमसी बैंक के इस बड़ी चूक के कारण अब 6 महीने बाद ही इसके अस्तित्व पर फैसला लिया जा सकेगा | यदि इस समय अंतराल में सब कुछ ठीक हो जाता है तो ठीक है अन्यथा इसका किसी अन्य बैंक में मर्जर करना पड़ेगा | यदि जमा कर्ताओं के पैसों की बात की जाए तो एक लाख तक की जमा राशि की देनदारी संबंधित इंश्योरेंस कंपनी की होती है | इसलिए ऐसे जमाकर्ताओं की राशि सुरक्षित है | लेकिन यदि जमा कर्ताओं ने एक लाख से ज्यादा की राशि जमा की होगी तो उसकी वापसी कब और कैसे होगी इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता |

भविष्य में इस तरह की कोई चूक ना हो इसलिए को-ऑपरेटिव बैंकों को ग्रामीण बैंकों की तर्ज पर अन्य किसी अनुसूचित बैंक से जोड़ा जाए | जिससे आरबीआई का पूर्ण नियंत्रण इन पर हो सके और इनकी सप्ताहिक गतिविधि को आरबीआई देख सके | समस्त ग्रामीण बैंक किसी ना किसी अनुसूचित बैंक से जुड़े होते हैं और आरबीआई के संपूर्ण गाइडलाइन का अनुसरण करते हैं | जिससे कभी भी ग्रामीण बैंकों में इस तरह की अनियमितता नहीं पाई गई | शहरी को-ऑपरेटिव बैंक भारत के सबसे खतरनाक सेक्टर हैं | भारत में जब भी वित्तीय आपदा आई है उसमें शहरी को-ऑपरेटिव बैंकों की संलिप्तता गंभीर रही है | शहरी को-ऑपरेटिव बैंकों को संबंधित राज्य सरकार के रजिस्ट्रार द्वारा चलाया जाता है | जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक हस्तक्षेप रहता है | रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को सिर्फ इनकी लिए गाइडलाइन जारी करने की शक्ति है | प्रत्येक कॉपरेटिव बैंक के मैनेजमेंट के इतिहास को देखें तो उसमें स्पष्ट राजनीतिक हस्तक्षेप दिखाई देता है | जिसके ऊपर आरबीआई के प्रत्येक गवर्नर ने चिंता जताई है क्योंकि यह बैंक राज्य सरकारों को पैसों का बंदरबांट करने में अहम भूमिका निभाते हैं इसलिए राज्य सरकारें इनसे अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहती हैं | इस तरह की कोऑपरेटिव बैंकों का दुरुपयोग चुनावों के समय में भी होता रहा है | यदि आज आरबीआई को स्वायत्तता दी गई होती और इसमें भी सुधार हुए होते तो इस तरह का मामला सामने नहीं आता | पीएमसी जैसी वित्तीय अनियमितता में प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकारें पूर्णतया जिम्मेदार हैं |

पीएमसी जैसी घटनाएं ना हो इसके लिए अब समय आ गया है कि राज्य सरकारों को अपना नियंत्रण को-ऑपरेटिव बैंकों से समाप्त करना पड़ेगा | इसके लिए केंद्र सरकार को इच्छाशक्ति भी दिखानी होगी क्योंकि इसके लिए संसद के माध्यम से कानून बनाने होंगे | इस मुद्दे पर पिछले सरकारों के समान ही वर्तमान केंद्र सरकार में भी इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती रही है | जिसके पृष्ठभूमि में आसानी से आरबीआई की नजरों से बचकर पैसों का बंदरबांट करना और चुनाव के समय में इनका दुरुपयोग करना है | जब पीएमसी जैसी कोई घटना घटती है तो राज्य सरकारें इसकी जिम्मेदारी लेने के स्थान पर बैंक पर ही दोष मढ़ देती हैं | जबकि प्रत्यक्ष रूप से इस तरह की वित्तीय अनियमितता में राज्य सरकारे ही जिम्मेदार हैं | जब राज्य सरकारें रजिस्ट्रार के माध्यम से कोऑपरेटिव बैंकों की साप्ताहिक जांच कराती रहती हैं तो निश्चित है कि जवाबदेही से बच नहीं सकती हैं | इस तरह की अनियमितता से बचने के लिए एकमात्र उपाय यही है कि इन बैंकों को भी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की तर्ज पर किसी अनुसूचित बैंक से जोड़ दिया जाए और राज्य सरकार की भूमिका को समाप्त कर दिया जाए | छोटे एवं मध्यम वर्गों के लिए को-ऑपरेटिव बैंक की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता लेकिन वर्तमान समय में यह बैंक लोगों को फायदा पहुंचाने से ज्यादा नुकसान करा रहे हैं | इससे लोगों का बैंकिंग सिस्टम से विश्वास उठ जाता है | इसलिए को-ऑपरेटिव बैंकों में त्वरित सुधार की आवश्यकता है |

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