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इंटरनेट का बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता नकारात्मक प्रभाव

कुलिन्दर सिंह यादव

हालिया एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 से 11 साल के करीब 6.6 करोड़ बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं | यह देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या का 15 प्रतिशत है | कम उम्र से ही इंटरनेट के ज्यादा उपयोग का प्रत्यक्ष प्रभाव बच्चों की कार्य क्षमता और मस्तिष्क पर पड़ रहा है | मौजूदा परिदृश्य में जहां इंटरनेट का बढ़ता उपयोग देश और दुनिया की समस्त जानकारियों को हम तक पहुंचा रहा है वहीं दूसरी तरफ इसका नकारात्मक प्रभाव भी बहुत ज्यादा है | आज की नई पीढ़ी का आत्मविश्वास और तकनीकी ज्ञान बहुत ही ज्यादा है | लेकिन ज्यादातर बच्चे जो इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं उनको यह जानकारी ही नहीं है कि किन चीजों को देखना चाहिए और किन चीजों से हमें दूर रहना है | वर्तमान समय में माता-पिता की दिनचर्या ऐसी हो गई है की उन्हें अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं है और वे बच्चों को इंटरनेट के साथ मोबाइल फोन उपलब्ध करा कर अपने कार्यों की इतिश्री कर लेते हैं | हालिया रिसर्च में यह सामने आया है कि यूट्यूब के 49% यूजर 15 वर्ष से कम के हैं | बच्चों द्वारा इंटरनेट का प्रयोग यूट्यूब और गेमिंग के उद्देश्य से ज्यादा हो रहा है यह चिंताजनक है | मोबाइल फोन और इंटरनेट के ज्यादा उपयोग के कारण बच्चों में आक्रामकता, व्यग्रता, प्रतिस्पर्धात्मक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है | वहीं वयस्कों में वैयक्तिकता की समस्या प्रबल रूप से देखने को मिल रही है | आजकल छोटे बच्चे भी माता-पिता की बातों को अनसुना कर रहे हैं | यह ज्यादा गेमिंग का दुष्प्रभाव है, कभी-कभी माता पिता के खिलाफ बच्चों के आक्रामक होने का भी मामला सुनने में आता है |

बच्चों के इंटरनेट तक पहुंच पर भारत के आईटी कानूनों को देखें तो पता चलता है कि आईटी कानूनों में इन मुद्दों पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया है | सोशल मीडिया और अन्य कई प्लेटफार्म न्यूनतम 13 वर्ष की गाइडलाइन जरूर तय करते हैं लेकिन इसको वेरीफाई करने के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है | 11 वर्ष से कम उम्र के ज्यादातर बच्चे अपने माता-पिता के मोबाइल से ही इंटरनेट तक पहुंच स्थापित करते हैं | जिसमें वह अपने माता-पिता के ही अकाउंट से अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का प्रयोग करते हैं | ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भी चुनौतियां हैं कि किस तरह से वह इन चीजों को कंफर्म कर सकें कि मोबाइल फोन का प्रयोग कौन कर रहा है | इस तरह इंटरनेट पर पहुंच उपलब्ध होने के बाद बच्चे अनजाने में कई तरह के साइबर अपराधों की चुंगल में फंस जाते हैं और इसका खामियाजा उनके माता-पिता को भी भुगतना पड़ता है | केंद्र सरकार ने 2008 में चाइल्ड पोर्नोग्राफी को रोकने के लिए कठोर कानूनों को बनाया है | जिसमें जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है इसी तरह के कानूनों को अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नियंत्रित करने के लिए बनाना होगा |

यहां पर सवाल यह उठता है कि 5 से 11 वर्ष के बच्चों को इंटरनेट की आवश्यकता क्यों है ? इसके लिए स्कूलिंग सिस्टम जिम्मेदार है क्योंकि आजकल ज्यादातर इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में बच्चों के होमवर्क और उनके प्रोजेक्ट ई-मेल पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं | स्कूल से ही बच्चों को इंटरनेट के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है यह पूर्णतया गलत है | इस पर राज्य सरकारों को ध्यान देने की आवश्यकता है | दूसरी तरफ बच्चों के माता-पिता स्वयं ही आवश्यकता से अधिक इंटरनेट और मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं इसलिए वे अपने बच्चों की इस आदत को छुड़ाने के लिए कोई सटीक उदाहरण नहीं बना पा रहे हैं |

आवश्यकता है कि केंद्र सरकार चरणबद्ध तरीके से पहले परिवार और समाज के लिए बाद में स्कूलों, कॉलेजों और अंत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए एक गाइडलाइन तैयार करें | हम सबको पता है कि कानूनों की एक सीमा होती है, और इस प्रकार के मुद्दों पर जब तक समाज और व्यक्ति स्वयं जागरूक होकर पहल नहीं करेगा तब तक इस प्रकार के दुष्प्रभाव को नहीं रोका जा सकता है | परिवार बच्चों की पहली नर्सरी होती है, इसलिए कानूनों के अतिरिक्त पहल हमें परिवार से ही करनी होगी | इंटरनेट वास्तविकता है लेकिन आवश्यकता से ज्यादा उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करना होगा और बच्चों के सामने यदि आवश्यक ना हो तो मोबाइल फोन का उपयोग कम करना होगा जिससे आप स्वयं ही बच्चों के सामने एक उदाहरण पेश कर सकें |

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