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गोरखालैंड की मांग उचित या अनुचित

संवादाता : कुलिन्दर सिंह यादव

हालिया जम्मू कश्मीर घटनाक्रम के बाद गोरखालैंड की मांग ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया है यहां हमें यह देखना है कि गोरखालैंड की मांग भारत से अलग राज्य की मांग नहीं है बल्कि यह भारत के संविधान के अंतर्गत ही भारतीय भौगोलिक क्षेत्र में एक नए राज्य की मांग है इसको खालिस्तान जैसी मांग से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए गोरखाओं के अनुसार उनको एक नया राज्य अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए चाहिए जो उनसे अभी तक छीनी जा रही है |
यदि बात करें कि गोरखा कौन है तो ये नेपाली मूल के भारतीय नागरिक हैं जो भारत के एक छोटे से क्षेत्र में निवास करते हैं | नेपाली साम्राज्य 17वीं और 18वीं शताब्दी में पूरे हिमालय में फैला हुआ था वर्ष 1777 में सिक्किम भी नेपाल का अंग बन गया था इसके साथ कुमाऊ गढ़वाल और कांगड़ा नेपाली साम्राज्य के अंतर्गत ही आते थे | माना जाता है कि नेपाली साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष के समय तीस्ता से लेकर सतलुज तक फैला हुआ था बाद में अंग्रेजों के आगमन के बाद वर्ष 1814 -16 में अग्लो-नेपाल युद्ध हुआ जिसमें हार के बाद नेपाल को अंग्रेजों के साथ सुगौली की संधि करनी पड़ी और अपने इन क्षेत्रों से हाथ धोना पड़ा | वर्ष 1960 में पहली बार हिलमैन एसोसिएशन ने अलग राज्य की मांग उठाई थी बाद में 1929 में गोरखा ऑफिसर्स एसोसिएशन और कुछ अन्य संगठनों ने भी अंग्रेजों के समक्ष बंगाल से अलग होने की अपनी मांग रखी 1935 में पहली बार दार्जिलिंग को बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत रखा गया क्योंकि भागलपुर बिहार से दार्जिलिंग का प्रशासन चलाना कठिन हो गया था और आगे के वर्षों में भी इस तरह की मांग उठती रही | लेकिन 70 के दशक में यह आंदोलन और तीव्र होने लगा क्योंकि वोट बैंक की राजनीति के कारण बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को बंगाल में बसाया जाने लगा जिससे गोरखाओं के साथ-साथ अन्य नृजातीय समूहों को हाशिए पर लाने का कार्य राज्य सरकार द्वारा किया गया गोरखालैंड की मांग गोरखाओ द्वारा अपनी पहचान ,संस्कृति ,इतिहास और प्रथा को सुरक्षित रखने के लिए थी इससे यह एक प्रासंगिक मांग साबित होती रही | गोरखालैंड की मांग के इतिहास में कुछ सशस्त्र विद्रोही हुए हैं जिनमें सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गठित गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट द्वारा चलाया गया आंदोलन प्रमुख था इसमें हजारों लोगों की मौत भी हुई इसके बाद समझौते में इन्हें राज्य सरकार ने कुछ स्वायत्तता दी लेकिन वहां की जनता इससे संतुष्ट नहीं थी | बाद के वर्षों में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व को जनता ने अस्वीकार किया और पिछले 15 वर्षों से विमल गुरुंग को गोरखालैंड के सबसे ताकतवर नेता के रूप में जाना जाता है इनकी छवि एक गांधीवादी नेता के रूप में उभरी है इन्होंने अपने संगठन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के माध्यम से इस मांग को आगे बढ़ाया |
गोरखालैंड की मांग को ज्यादातर विशेषज्ञ खारिज करते हैं क्योंकि उनका मानना है इससे अलग राज्यों की मांग की एक नई कड़ी प्रारंभ हो सकती है जिसमें बोडोलैंड,बुंदेलखंड,सौराष्ट्र और विदर्भ की मांग प्रमुख है इसके अतिरिक्त यह क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह छोटा सा क्षेत्र ही हमें पूर्वोत्तर भारत में संपर्क का एक मार्ग उपलब्ध कराता है इस क्षेत्र पर चीन हमेशा मौके की तलाश में नजरें गड़ाए बैठा रहता है यदि किसी कारणवश भविष्य में इस क्षेत्र में कोई समस्या उत्पन्न होती है तो हमें पूर्वोत्तर को नियंत्रित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा कुछ लोगों का मानना यह भी है कि जहां लोकसभा की मात्र एक सीट है और विधानसभा की भी सीटें सीमित हैं इतने कम क्षेत्र को एक राज्य का दर्जा देना सही रणनीति नहीं होगी कुछ विशेषज्ञों का मानना यह भी है की यदि अलग राज्य की मांग स्वीकार भी कर ली जाती है तो इस क्षेत्र का आय का साधन क्या होगा लेकिन यहां पर हमें ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह क्षेत्र पर्यटन और चाय की खेती के मामले में अन्य क्षेत्रों से अच्छी स्थिति में है और पश्चिम बंगाल सरकार की गलत नीतियों के कारण इस क्षेत्र से अर्जित किए गए धन का उपयोग बंगाल के अन्य क्षेत्रों में किया जाता है और यह क्षेत्र अवसंरचनात्मक विकास में काफी पिछड़ा हुआ है इस बात का भी गुस्सा यहां की जनता में है |
समग्रता से इस मुद्दे का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि गोरखालैंड की मांग तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए उचित है लेकिन इसको स्वीकार करना भारत के हित में नहीं है हमें बातचीत के माध्यम जल्द से जल्द से इस मसले का हल निकालना होगा और उनकी जो भी जायज शर्तें हैं उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है इसके साथ ही कुछ इस तरह के प्रावधान करने होंगे की जो आय इस क्षेत्र के पर्यटन और चाय के व्यापार से होती है उस का ज्यादातर हिस्सा इसी क्षेत्र के विकास पर खर्च किया जाए इनके प्रथाओं और संस्कृति में किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप ना किया जाए यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील है इसलिए यहां पर शांति बनी रहे यही संपूर्ण भारत के हित में है

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