परमाणु नीति में परिवर्तन समय की आवश्यकता

परमाणु नीति में परिवर्तन समय की आवश्यकता

कुलिन्दर सिंह यादव

हाल ही में भारतीय रक्षामंत्री का पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी के पुण्यतिथि पर पोखरण से जहां पर भारत ने 1998 में लगातार पांच परमाणु परीक्षण किए थे परमाणु नीति बदलने से संबंधित बयान विश्व मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है |
यदि भारत के परमाणु नीति की बात की जाए तो भारत ने ऐतिहासिक संदर्भों में हमेशा परमाणु विषयों पर पूर्ण निशस्त्रीकरण पर बल देते हुए शांतिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के विकल्प पर कोई समझौता न करने की नीति को प्रस्तावित किया है पचास के दशक से ही भारत ने परमाणु हथियारों के पूरे विश्व से सफाई पर बल देते हुए वैश्विक स्तर पर विभिन्न बैठकों एवं संधियों में इसी पक्ष का समर्थन किया है 1988 में संयुक्त राष्ट्र में राजीव गांधी कार्य योजना इसी रुख पर आधारित है दुर्भाग्य से अमेरिका एवं तत्कालीन सोवियत संघ ने लगातार परमाणु हथियारों में वृद्धि की और चीन ब्रिटेन और फ्रांस भी नाभिकीय ताकत से जुड़े इन्होंने न्यूक्लीयर फाइव की संकल्पना को अस्तित्व में लाया इन देशों ने इसके बाद इस बात पर बल दिया की अन्य देश नाभिकीय क्षमता हासिल ना कर सकें लेकिन अपने नाभिकीय हथियारों में कमी लाने का गंभीर प्रयत्न इन देशों द्वारा नहीं किया गया | 1962 में चीन के भारत पर आक्रमण ने भारत की सामरिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए ऐसे में पूर्ण निशस्त्रीकरण के अभाव में भारत को मजबूरी में परमाणु हथियार बनाने का विकल्प चुनना पड़ा 1988 में भारत ने अपनी परमाणु नीति घोषित की जो तीन संकल्पनाओं पर आधारित थी बाद की सरकारों ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया जिनमें विश्वसनीयता प्रभावशीलता और उत्तरजीविता प्रमुख हैं | जिनमें यदि विश्वसनीयता की बात करें तो भारत तीन घोषणाओं द्वारा इस नीति में परमाणु मुद्दे पर अपनी विश्वसनीयता को प्रमाणित करता है प्रथम उपयोग ना करने की घोषणा अर्थात भारत यह स्पष्ट घोषणा करता है कि वह किसी भी परिस्थिति में पहले परमाणु हमला नहीं करेगा इसके साथ भारत गैर परमाणु शक्ति संपन्न देश पर कभी भी परमाणु हमला नहीं करेगा और भारत नागरिक क्षेत्रों पर परमाणु हमले के विकल्प को यथासंभव रोकने का प्रयास करेगा |
विश्वसनीयता के समानांतर यह परमाणु नीति प्रभावशीलता को महत्व देते हुए एक नाभिकीय कमांड प्राधिकरण का विकल्प देती है जिसके दो स्तर होते हैं पहला राजनीतिक परिषद जिनमें प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में उनके वरिष्ठतम सहयोगी शामिल होते हैं और दूसरा कार्यकारी परिषद जिनमें तीनों सेनाओं के अध्यक्ष परमाणु वैज्ञानिक ब्यूरोक्रेट नौकरशाह व अन्य विशेषज्ञों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी शामिल होते हैं इसमें राजनैतिक परिषद को परमाणु मुद्दे पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार होता है यदि अब हम उत्तरजीविता की बात करें तो प्रथम उपयोग ना करते हुए भी अपनी उत्तरजीविता को बनाए रखना एक जटिल पक्ष है जिसे प्राप्त करने के लिए भारत ने त्रिस्तरीय रणनीति प्रस्तावित की थी जिनमें सेना के तीनों अंगों विशेषकर नौसेना को परमाणु हमला करने के लिए सक्षम बनाना शामिल था कोई देश प्रमाण चलित पनडुब्बियों के सहारे अपने नाभिकीय हथियारों के एक भाग को दुश्मन की नजर से दूर किसी मित्र राष्ट्र की समुद्री सीमा में रखकर अपनी उत्तरजीविता को हर हाल में संरक्षित रख सकता है |
यदि वर्तमान समय में हम विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की परमाणु नीतियों का अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि चीन 1964 से ही प्रथम उपयोग ना करने की नीति पर आगे बढ़ रहा है और आज भी इस नीति पर कायम है रूस के परिपेक्ष में हमें देखने को मिलता है कि रूस ने 2010 में जो परमाणु नीति अपनाई है उसके अंतर्गत उन्होंने किसी भी हमले के प्रत्युत्तर में परमाणु हथियारों के चयन के लिए अपने को स्वतंत्र रखा है आशय यह है कि रूस किसी भी हमले के जवाब में परमाणु हथियार प्रयोग कर सकता है चाहे वह हमला गैर परमाणु हथियारों का ही क्यों ना हो इसी श्रेणी में अमेरिका ,यूनाइटेड किंग्डम और पाकिस्तान भी अपने आप को रखते हैं |
रक्षामंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और रूस की संधि समाप्त हुई है जिससे अब दोनों देश अधिक प्रभावशाली हथियार बनाने की होड़ में लग गए हैं उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया का विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है इसके साथ-साथ पाकिस्तान लगातार परमाणु हमले की धमकी देता रहा है वहीं चीन अपने मिसाइलों की भेदन सीमा को लगातार बढ़ाने के लिए प्रयासरत है रक्षा मंत्री का यह बयान इस क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिए चुनौती उत्पन्न कर सकता है इससे प्रेरित होकर अन्य देश भी अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के लिए परमाणु परीक्षण करने की तैयारी कर सकते हैं जो कि विश्व शांति के लिए एक खतरा होगा यदि हम अपनी परमाणु नीति को बदलते हैं तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारी पुरानी परमाणु नीति में जो एक विशेष खंड सम्मिलित है जिसमें भारत गैर परमाणु शक्ति संपन्न देश पर कभी भी परमाणु हमला नहीं करेगा इसको बरकरार रखना चाहिए इस एक विशेष खंड के कारण ही विश्व के अनेक छोटे देश जो परमाणु संपन्न नहीं हैं परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए प्रत्येक मंच पर भारत के नीति के समर्थन में खड़े रहते हैं इसके साथ ही अन्य देश जो भारत के नाभिकीय संयंत्रों को बिना परमाणु निशस्त्रीकरण संधि पर हस्ताक्षर किए ईंधन उपलब्ध कराते हैं उनका भी विश्वास इसी विशेष खंड की वजह से बना हुआ है एक जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां हैं लेकिन पड़ोसियों से लगातार मिल रही चुनौतियों के कारण परमाणु नीति में संशोधन समय की आवश्यकता है लेकिन ऐसा परिवर्तन करने से पहले मित्र राष्ट्रों को भारत के सामने उभरती चुनौतियों के बारे में अपना पक्ष रखकर उनका भी विश्वास हासिल करने की जरूरत है |

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