पुलिस सुधार समय की मांग

पुलिस सुधार समय की मांग

कुलिन्दर सिंह यादव

राज्य में कानून व्यवस्था एवं शांति को बनाए रखने में पुलिस की अहम भूमिका होती है | लेकिन मौजूदा समय में पुलिस की कार्यशैली और व्यवहार पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं | पुलिसिंग की स्थिति पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार पुलिस हमारी उम्मीदों को पूरा क्यों नहीं कर पाती ? इसके अनेक कारण बताए गए हैं | जिनमें ड्यूटी का समय निर्धारित ना होना, त्योहारों पर छुट्टियों का ना मिलना, इसके अतिरिक्त कार्यकाल के दौरान मात्र छह फीसदी को अतिरिक्त ट्रेनिंग मिल पाना शामिल है | पुलिस से लोगों का भरोसा और अपराधियों का डर दोनों कमजोर हो रहा है |
पुलिसिंग का कार्य भारत में दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है | प्रत्येक वर्ष ड्यूटी के दौरान लगभग पांच सौ से आठ सौ पुलिसकर्मियों की जाने जाती हैं | यह आंकड़ा विश्व के अन्य देशों में आठ से दस तक ही सीमित रहता है | भारत में पुलिस को ना तो आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं, और ना ही पुलिस पर विश्वास किया जाता है | यहां तक कि भारत में पुलिस के उच्च अधिकारियों के समक्ष भी दिए गए बयान को साक्ष्य नहीं माना जाता है | अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रति एक लाख जनसंख्या पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए | लेकिन भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 189 पुलिसकर्मी की ही स्वीकृति है, और उसमें भी लगभग 35 प्रतिशत की कमी है | जहां एक तरफ संख्या बल में कमी है वहीं दूसरी तरफ पुलिस बलों के लिए वाहनों की कमी और फॉरेंसिक सपोर्ट नाम मात्र का है | इसके साथ-साथ अवसंरचनात्मक कमियां भी हैं | बहुत सारे मौकों पर पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहते हैं | लेकिन वाहनों की कमी या स्टाफ की कमी से वह ऐसा नहीं कर पाते | इन सबके बावजूद भी पुलिस हमारी सेवा में दिन-रात लगी रहती है |
भारत के सात राज्यों में पुलिस कर्मियों को लगभग 18 घंटों तक ड्यूटी करनी पड़ती है | बिहार में कहीं-कहीं ऐसे थाने हैं | जहां मात्र एक ही पुलिसकर्मी की तैनाती है | हालांकि कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां पर ज्यादा काम के बदले पुलिस कर्मियों एक माह का अतिरिक्त वेतन दिया जाता है | लेकिन राज्य सरकारों को यह समझने की आवश्यकता है कि एक माह का अतिरिक्त वेतन दैनिक तनाव को कम नहीं कर सकता | कुछ राज्यों ने सप्ताह में एक दिन छुट्टी देने का भी प्रावधान किया | लेकिन संख्या बल की कमी के कारण यह मूर्त रूप नहीं ले सका |
ज्यादातर प्रदेशों में जो राजनैतिक नेतृत्व है | वह सामंतवादी है और पुलिस व्यवस्था पर वह खर्च नहीं करना चाहते | वहीं कुछ राज्य बेहतर सुधार भी कर रहे हैं | राज्यों के पास धन का अभाव नहीं है, बल्कि धन के सदुपयोग की कमी जरूर है | धन को खर्च कहां करना है, राज्य इसकी प्राथमिकताएं ही नहीं बना पाते | जिसकी वजह से प्रतिवर्ष राष्ट्रीय संपत्ति का जो नुकसान होता है इसका आकलन जीडीपी के 9 प्रतिशत तक किया गया है | सरकारें लगातार केंद्रीय पुलिस बलों की संख्या में वृद्धि कर रही हैं जो तर्कसंगत नहीं है |
पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने का मतलब है, समुद्र में मंथन कर अमृत निकालना | राजनैतिक नेतृत्व पुलिस व्यवस्था में बदलाव लाना नहीं चाहते हैं | क्योंकि पुलिस उन्हीं के इशारों पर चलती है | फिर भी जनता के दबाव, विभिन्न आंदोलनों, पुलिस सुधार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आंशिक परिवर्तन हमें पुलिस सुधार में देखने को मिल रहा है | पुलिस को अब कानून व्यवस्था और जांच-पड़ताल दो अलग विंग में विभाजित करने की आवश्यकता है | जिससे पुलिस का दबाव कम किया जा सके | अभी तक यदि किसी क्षेत्र विशेष में कोई त्यौहार होता है या किसी वीआईपी का आगमन होता है | तो समस्त पुलिस बल उसी में व्यस्त हो जाता है | इस दौरान जांच प्रक्रिया बाधित रहती है | इसलिए समय की मांग है कि पुलिसिंग व्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए पुलिस को दो विंग में विभाजित किया जाए | यह तभी संभव हो सकता है जब आपराधिक जांच प्रक्रिया फॉरेंसिक साक्ष्यों पर आधारित हो | इसलिए इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है | इन सबके अतिरिक्त कार्यस्थल पर माहौल बनाने की जरूरत है, जिससे पुलिसकर्मी दबाव मुक्त कार्य कर सकें | पुलिस बल में जो रिक्तियां हैं उनको केंद्रीय पुलिस बलों के 45 वर्ष से ज्यादा वर्ग के पुलिसकर्मियों से भरी जा सकती है | इससे सरकार के धन और समय दोनों की बचत होगी | पुलिस बलों का वेतन भी बढ़ाई जाने की आवश्यकता है जिससे वह अपना काम ईमानदारी के साथ कर सकें | लेकिन कानून व्यवस्था राज्य का विषय होने के बावजूद राज्य सरकारें पुलिस सुधार को लेकर गंभीर नहीं हैं | इसके लिए हम सबको आवाज उठानी होगी तभी हम इस सिस्टम को मजबूत कर पुलिसिंग व्यवस्था को सुधार सकते हैं |

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