यूएपीए संशोधन का विरोध क्यों ?

यूएपीए संशोधन का विरोध क्यों ?

कुलिन्दर सिंह यादव

संसद सत्र के दौरान विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण विधेयक जिसको यूएपीए के नाम से भी जानते हैं, में संशोधन देश में आंतरिक सुरक्षा के जानकारों के मध्य चर्चा का विषय बना हुआ है | यूएपीए को वर्ष 1967 में सोलहवां संवैधानिक संशोधन अधिनियम के अंतर्गत लाया गया था | जिसके अंतर्गत संसद अनुच्छेद 19 में उल्लेखित मौलिक स्वतंत्रता के अधिकारों पर देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए कानून बना सकती है |
यह अधिनियम एक कानूनी हथियार के रूप में सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा | नियमित अंतराल पर परिवर्तनों के कारण यह सुरक्षा बलों की नई सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में सहायक बना रहा | इस अधिनियम में लगातार 1969, 1972, 1986, 2004, 2008, 2012 में परिवर्तन होते रहे, लेकिन अब 2019 में पांच नए महत्वपूर्ण प्रावधानों को जोड़ने से यह विवाद का विषय बन गया है |
नए प्रावधानों के अनुसार अब केंद्र सरकार व्यक्ति विशेष को पुरानी शक्तियों के आधार पर आतंकवादी घोषित कर सकती है | पहले के प्रावधानों में किसी आतंकी गतिविधि में संलग्न होने पर या आतंकी गतिविधियों के तैयारियों से जुड़े होने पर या किसी भी प्रकार से आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने में सहयोग देने पर किसी संस्था को आतंकी संस्था घोषित किया जा सकता था | उसी आधार पर अब व्यक्ति विशेष को आतंकी घोषित किया जा सकेगा | यह परिवर्तन गंभीर चर्चा का विषय बन गया है, दूसरे प्रावधान में पहले जो संपत्ति आतंकवाद के उपयोग में लाई जाती थी | उसको सीज करने का अधिकार केवल राज्य के पुलिस महानिदेशक का होता था | नए प्रावधानों में एनआईए के महानिर्देशक भी संपत्ति सीज का आदेश दे सकेंगे | इसके अतिरिक्त पहले आतंकी मामलों की जांच डिप्टी एसपी, असिस्टेंट कमिश्नर या उनसे ऊपर के रैंक के अधिकारी ही कर सकते थे | लेकिन अब एनआईए के इस्पेक्टर भी आतंकी घटनाओं की जांच कर सकेंगे | पुराने अधिनियम में 19 संधियां थी जिनमें किसी भी गतिविधि का जुड़ाव उन संधियों से होने पर वह आतंकी गतिविधियां हो सकती थी | अब इनमें एक नई संधि जोड़ी गई है जो अंतर्राष्ट्रीय महत्व की है | जिसके अंतर्गत कोई गतिविधि जो अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय संधि का अतिक्रमण करेगी अब उसे आतंकी गतिविधि घोषित किया जा सकेगा |
यह संशोधन अपने पीछे एक गंभीर बहस छोड़ गया है जो अति गंभीर दुविधा को जन्म देता है | जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के कर्तव्य को एक दूसरे के समक्ष खड़ा करता है |
इसमें नागरिक समाज के सदस्यों को नागरिकता की रक्षा के लिए राज्य के जिम्मेदारियों के निर्वहन के बदले कुछ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्पण करना पड़ेगा | अब सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में राज्य द्वारा अतिक्रमण किया जाए तो इसकी विभाजन रेखा क्या होनी चाहिए | व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीनने के कारण राज्यों पर पुलिसराज्य, अधिनायकवादी राज्य में परिवर्तित होने का आरोप लगता है | यदि कोई राज्य किसी समय गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जूझता हो, तो उस समय में जरूरी है कि राज्य के नागरिक अपनी कुछ व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं का परित्याग करें | जिससे राज्य नागरिकता के संरक्षण के लिए अपने दायित्वों का निर्वहन कर सके |
वर्तमान समय में भारत गंभीर रूप से आतंकवाद और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है, इसलिए हमें आवश्यकता है प्रभावशाली कानूनों की कठोर प्रावधानों की, जिससे आतंकवाद और अन्य सुरक्षा चुनौतियों से निपटा जा सके | लेकिन इस प्रक्रिया में हमें लक्ष्मणरेखा नहीं पार करनी चाहिए | जिससे राज्य को पुलिस राज्य या अधिनायकवादी राज्य का टैग मिले |
यदि यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक परीक्षण के लिए जाता है, और न्यायालय इसका परीक्षण कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से करता है, तो उम्मीद है यह न्यायिक परीक्षण से निकल पाएगा | लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट कानून के उचित प्रक्रिया के सिद्धांत को लागू करें तो उम्मीद कम ही है की यह न्यायिक परीक्षण को पास कर पाएगा | क्योंकि यहां पर राज्य एक व्यक्ति विशेष को आतंकवादी घोषित कर रहा है, और राज्य द्वारा यह कहा जा रहा है कि इसका दुरुपयोग रोकने के लिए हमने चार चरण तैयार किए हैं | भारत में विशेष कानूनों का अपना अनुभव अच्छा नहीं रहा है | उदाहरण के लिए आप टाडा, पोटा और मीसा को देख सकते हैं | आशंका इस बात की भी है कि यदि कोई व्यक्ति जिसको आतंकी घोषित किया गया है और बाद में न्यायपालिका उसको निर्दोष पाती है तो उस व्यक्ति को पुनः किस प्रकार से मुख्यधारा में लाया जाएगा | लेकिन इसी समय हमें यह भी समझने की आवश्यकता है कि जब भारत सरकार द्वारा किसी संस्था को आतंकी घोषित किया जाता था | तो कुछ ही समय में एक नए नाम से दूसरी संस्था खोलकर पुनः उन्हीं गतिविधियों में उनकी संलिप्तता पाई जाती जाती थी | इस तरह भारत सरकार के लिए यह गंभीर चुनौती थी | इसके अतिरिक्त जब भारत सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र में अजहर मसूद और हाफिज सईद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए प्रयास किया गया | तो बहुत से देशों ने यह मुद्दा उठाया की पहले आप अपने देश में इनको आतंकी क्यों नहीं घोषित करते | उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि द्वारा भारतीय कानूनों में इस तरह के प्रावधान ना होने की बात कही गई | इसलिए दोबारा ऐसी समस्याएं हमारे सामने ना उत्पन्न हो इसलिए भी यह महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया | वर्तमान परिदृश्य में इस तरह के संशोधन की आवश्यकता है | लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इनका दुरुपयोग पूर्व के कानूनों की तरीके से ना हो |

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